चंडीगढ़। जगतार सिंह हवारा द्वारा अपनी बुजुर्ग और कथित रूप से अस्वस्थ मां से मिलने के लिए अस्थायी पैरोल की मांग एक संवेदनशील मामला है। इसमें मानवीय भावनाओं और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। लंबे समय से बेटे से अलग रह रही बुजुर्ग मां की अपने बेटे से मिलने की इच्छा स्वाभाविक है। मानवीय दृष्टि से देखें तो सीमित अवधि के लिए भी मां-बेटे की मुलाकात करवाना संवेदनशील और मानवीय कदम हो सकता है। हालांकि, पूर्व पंजाब मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हवारा की स्थिति को देखते हुए अस्थायी रिहाई पर फैसला लेते समय व्यापक सुरक्षा व्यवस्था को भी ध्यान में रखना जरूरी है। ऐसे में बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। उचित सुरक्षा और निगरानी के बीच हवार को एक दिन के लिए अपनी मां से मिलने की अनुमति दी जा सकती है। इससे मानवीय पहलू का भी सम्मान होगा और लंबे समय की खुली पैरोल से जुड़ी संभावित जटिलताओं से भी बचा जा सकेगा। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जुलाई 2026 के अपने आदेश में संबंधित अधिकारियों को जरूरी टिप्पणियां और सिफारिशें हासिल करने के बाद हवारा की पैरोल याचिका पर तय समय में प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। अदालत ने खुद उसकी रिहाई का आदेश नहीं दिया था। सुरक्षा विशेषज्ञ प्रो. बलजीत सिंह ने कहा कि इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि ऐसे मामले में फैसला जनता की भावनाओं या राजनीतिक विचारों के बजाय सक्षम सुरक्षा और जेल अधिकारियों के ताजा आकलन के आधार पर किया जाना चाहिए। पंजाब ने पिछले कई वर्षों में शांति और स्थिरता बनाए रखने की दिशा में काफी प्रगति की है। ऐसे में किसी हाई-प्रोफाइल कैदी से जुड़े मामले में फैसला संतुलित, परिस्थितियों के अनुरूप और कड़ी निगरानी के साथ लिया जाना चाहिए। मां से सीमित अवधि के लिए निगरानी में मुलाकात की अनुमति देना मानवीय संवेदना दिखाने का रास्ता हो सकता है, साथ ही संस्थागत जिम्मेदारी और आम जनता की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा सकती है। वहीं, लंबी अवधि की पैरोल पर फैसला लेने से पहले विस्तृत सुरक्षा आकलन करना उचित होगा। मकसद करुणा से इनकार करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि करुणा और सावधानी साथ-साथ चलें।

